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Bodh Dharm in Hindi - बौद्ध धर्म का इतिहास With PDF

Bodh Dharm in Hindi - बौद्ध धर्म का इतिहास With PDF

 छठी शताब्दी ईसा पूर्व में भारत में दूसरे नगरीकरण' के तत्त्व पुनः प्रकट हुए जो सिन्धु सभ्यता के बाद पतनोन्मुख हो गये थे। भारतीय इतिहास का यह काल' धार्मिक क्रांति' का काल था। इस काल में चिंतन के क्षेत्र में एक ऐसी नवीन शक्ति एवं अद्भुत संपन्नता का आविर्भाव हुआ, जिसने न केवल भारत वरन् विश्व के एक बड़े समुदाय को प्रभावित किया। 

Bodh Dharm in Hindi - बौद्ध धर्म का इतिहास

Bodh Dharm in Hindi - बौद्ध धर्म का इतिहास With PDF
Bodh Dharm in Hindi - बौद्ध धर्म का इतिहास With PDF


यह समय अनेक दार्शनिकों के आविर्भाव व कार्यों के लिए ज्यादा प्रासंगिक है, जिन्होंने अपने विचारों को जन-जन के मानस पटल पर अंकित किया था। इन दार्शनिकों में से अधिकांशत: वैदिक काल के यज्ञ व धार्मिक कर्मकाण्डों की सर्वश्रेष्ठता के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हुए थे और इन्होंने रूढ़िगत वैदिक ब्राह्मण व्यवस्था का विरोध किया था। इन विचारों का प्रचार उन व्यक्तियों ने किया था, जो श्रमण थे, अर्थात् वे ऐसे व्यक्ति थे, जिन्होंने गृहस्थ जीवन को त्याग कर साधु जीवन का संकल्प किया था। 

इन सब गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र मगध था। मगध में इस काल में एक विशाल साम्राज्य की नींव पड़ रही थी। इस धार्मिक क्रांति के प्रणेता गौतम बुद्ध एवं महावीर स्वामी थे। उस समय बौद्ध धर्म के प्रवर्तक गौतम बुद्ध एवं जैन धर्म के प्रमुख तीर्थंकर महावीर स्वामी का अविर्भाव हुआ जिन्होंने तत्समय प्रचलित वैदिक यज्ञ प्रधान कर्मकाण्डों का विरोध कर जन-सामान्य को मोक्ष प्राप्ति का सरल मार्ग बताया।

महात्मा गौतम बुद्ध : बौद्ध धर्म के प्रवर्तक

जन्म : 563 ई.पू. में वैशाख पूर्णिमा को कपिलवस्तु के निकट लुम्बिनी वन (अब नेपाल में) में साल वृक्ष के नीचे
पिता : शुद्धोधन (कपिलवस्तु के शाक्य गणराज्य के प्रधान)
माता : महामाया (देवदह कोलियगण की राजकन्या)
बचपन का नाम : सिद्धार्थ।
पत्नी: यशोधरा (कोलिय गणराज्य की राजकुमारी) 
पुत्र : राहुल।

Note - जन्म के 7वें दिन माता की मृत्यु के पश्चात् विमाता (मौसी व सौतेली माँ) प्रजापति गौतमी द्वारा लालन-पालन।
सिद्धार्थ के बारे में ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की थी किं वे या तो चक्रवर्ती सम्राट बनेंगे या महान् साधु । कौडिन्य एवं काल देवल ने इनके 'बुद्ध' बनने की भविष्यवाणी की थी।
ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के मद्देनजर उन्हें विलासिता की सभी वस्तुएँ उपलब्ध कराई गई तथा उनका विवाह 16 वर्ष की आयु में कर दिया गया।

चार दृश्य जिसने सिद्धार्थ का जीवन परिवर्तित किया एवं उन्हें सांसारिक मोहमाया त्यागकर संन्यास ग्रहण करने हेतु प्रेरित किया
  1. वृद्ध व्यक्ति
  2. व्याधिग्रस्त (रोगग्रस्त) मनुष्य
  3. एक मृतक
  4. प्रसन्न मुद्रा में एक संन्यासी।
Note - ये उनके जीवन की प्रथम चार घटनाएँ मानी जाती हैं।

सिद्धार्थ ने लगभग 29 वर्ष की आयु में रात्रि में सबको सोते हुए छोड़ गृह त्याग दिया। बौद्ध साहित्य में यह घटना 'महाभिनिष्क्रमण' कहलाती है। गृहत्याग के बाद उन्होंने गोरखपुर के समीप अनोमा नदी के तट पर संन्यास धारण किया। वैशाली के आलारकालाम उनके प्रथम गुरु बने. जिनसे उन्होंने सांख्य दर्शन की शिक्षा ग्रहण की। बाद में उन्होंने राजगृह में उद्दक रामपुत्त से शिक्षा प्राप्त की।

सिद्धार्थ को सारनाथ में निरंजना नदी, (वर्तमान पुनपुन) के किनारे पीपल वृक्ष (Banayan Tree) के नीचे 48 दिन तक समाधि धारण करने के उपरान्त वैशाख पूर्णिमा की रात को (लगभग 35 वर्ष की आयु में) कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई। ज्ञान प्राप्ति पर सिद्धार्थ 'बुद्ध' कहलाए तथा वह वृक्ष व स्थान क्रमशः बोधिवृक्ष एवं बोधगया कहलाया बौद्ध धर्म में ज्ञान प्राप्त होने की घटना को सम्बोधि कहा जाता है ।

बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश सारनाथ (ऋषिपतनम ) के हिरण्य वन में उन पाँच ब्राह्मणों (कौडिन्य, आंज, अस्साजि, वप्प और भद्धिय) को दिया था जो पूर्व में उरुबेला में उनके साथ तपस्या कर रहे थे तथा बुद्ध के छ: वर्ष की ।तपस्या के बाद भोजन ग्रहण करने पर उन्हें पथभ्रष्ट समझकर छोड़कर चल गए थे। बुद्ध के प्रथम धर्मोपदेश को बौद्ध साहित्य में धर्मचक्रप्रवर्तन कहा जाता है।

बुद्ध ने जनसाधारण की भाषा 'मागधी' में अपने उपदेश दिए। कोशल की राजधानी 'श्रावस्ती' में उन्होंने सर्वाधिक उपदेश दिए।

आनन्द व उपालि उनके प्रधान शिष्य थे।

45 वर्ष तक धर्म का प्रचार प्रसार करने के बाद 80 की आयु में 483 ई. पू. में कुशीनगर, (मल्लगणराज्य की राजधानी) में वैशाख पूर्णिमा को बुद्ध की मृत्यु हो गई, जिसे बौद्ध साहित्य में 'महापरिनिर्वाण' मृत्यु कहा गया है।

बुद्ध ने अपना अंतिम उपदेश शुभच्छ या शुभद्द (कुशीनगर का परिव्राजक) को दिया व उसे अपना अंतिम शिष्य बनाया।
तपस्सु और कलिक बुद्ध के प्रथम शुद्र अनुयायी थे।

एक अनुश्रुति के अनुसार मृत्यु के बाद बुद्ध के शरीर के अवशेषों को आठ भागों में बाँटकर उन पर आठ स्तूपों का निर्माण कराया गया।                                         

महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़े 8 स्थान


(1) लुम्बिनी, (2) गया, (3) सारनाथ, (4) कुशीनगर (कुशीनारा), (5) श्रावस्ती, (6) संकास्य, (7) राजगृह, (8) वैशाली। बौद्ध ग्रंथों में इन्हें 'अष्टमहास्थान' के नाम से जाना जाता है।

बुद्ध के जीवन से जुड़े चार पशु

  1. हाथी - बुद्ध के गर्भ में आने का प्रतीक
  2. सांड - यौवन का प्रतीक
  3. घोड़ा - गृह त्याग का प्रतीक
  4. शेर - समृद्धि का प्रतीक

अन्य प्रतीक

जन्म-कमल व सांड,
निर्वाण-बोधिवृक्ष,
प्रथम उपदेश धर्मचक्र 
परिनिर्वाण-स्तूप               

बुद्ध के जीवन की घटनाएँ:

  1. महाभिनिष्क्रमण - गृहत्याग की घटना
  2. सम्बोधि - ज्ञान प्राप्त होने की घटना
  3. धर्मचक्रप्रवर्तन - उपदेश देने की घटना
  4. महापरिनिर्वाण- मृत्यु

बौद्ध धर्म में संघ का अर्थ बौद्ध भिक्षुओं के जनतांत्रिक संगठन से था। महाप्रजापति गौतमी - महात्मा बुद्ध की विमाता, जिन्होंने उनका लालन पालन किया। ये वैशाली में बुद्ध के संघ में प्रथम महिला के रूप में प्रविष्ट हुईं।

वैशाख पूर्णिमा के दिन 'बुद्ध का जन्म', 'ज्ञान की प्राप्ति' और 'मृत्यु" हुई थी। अत: बौद्ध धर्म में वैशाख पूर्णिमा का अधिक महत्त्व है। 
बौद्ध धर्म के त्रिरत्नः बुद्ध, धम्म तथा संघ।

अष्टांगिक मार्ग को भिक्षुओं का कल्याण मित्र' कहा गया है।                                                                    बौद्ध धर्म के अनुसार मानव जीवन का परम लक्ष्य है 'निर्वाण प्राप्ति' अर्थात् जीवन-मरण के चक्र से मुक्ति। बुद्ध के अनुसार यह निर्वाण इसी जीवन में प्राप्त हो सकता है, परंतु महापरिनिर्वाण मृत्यु के बाद ही संभव है।                          
बुद्ध ने 'दस शीलों के अनुशीलन को नैतिक जीवन का आधार बताया है। इन्हें 'शिक्षापद' कहा जाता था। ये निम्न हैं 
अहिंसा, अपरिग्रह, ब्रह्मचर्य, सत्य, धर्म में श्रद्धा, दोपहर बाद भोजन का निषेध, विलास से विरक्ति, सुगन्धित द्रव्यों का निषेध, आरामदायक बिस्तर का त्याग एवं आभूषण वगैरह का निषेध। 

बुद्ध ने संघ में महिलाओं के प्रवेश की 8 शर्ते लगाई थी।

बौद्ध धर्म अनात्मवादी है, अत: यह आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता। उनके अनुसार शरीर पंच स्कन्धों (रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार एवं विज्ञान) से युक्त है। परन्तु बौद्ध धर्म पुनर्जन्म एवं कर्मवाद में विश्वास करता है। उनके अनुसार पुनर्जन्म आत्मा के अस्तित्व के बिना भी संभव है। बुद्ध के अनुसार मनुष्य के कर्म ही उसके सुख-दुःख का निर्धारण करते हैं। सत्कर्म का फल श्रेष्ठ व दुष्कर्म का फल निकृष्ट होता है। यही कर्मफल पुनर्जन्म का हेतु (कारण) है। पुनर्जन्म आत्मा का नहीं बल्कि अस्थाई अहंकार का होता है।

बौद्ध धर्म मूलत: 'अनीश्वरवादी ' है तथा वेदों की प्रामाणिकता को नहीं मानता है व वेदवाद का विरोधी था। इसे नास्तिक दर्शन भी कहा जाता है। महात्मा बुद्ध ने वेदों की श्रेष्ठता व ईश्वर जैसी अलौकिक सत्ता के अस्तित्व को नहीं माना। उनके अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति एवं परिचालन कर्मों की गति से स्वतः होता है। उन्होंने इसे अनिर्मित, अनादि एवं अनंत बताया। 

महात्मा बुद्ध ने उपदेश दिया कि निर्वाण या मोक्ष किसी ईश्वर की दया या प्रसन्नता से नहीं बल्कि मनुष्य की स्वयं की अविद्या व तृष्णा के विनाश के बाद कर्मगति रुक जाने पर होता है। उन्होंने निर्वाण प्राप्ति हेतु यज्ञ, कर्मकाण्डों एवं ईश्वर की स्तुति एवं प्रार्थनाओं को निरर्थक बताया। उन्होंने कर्म की सात्विकता पर जोर दिया तथा उसे अधिक महत्त्वपूर्ण बताया। उनके अनुसार इसी से पूर्व कर्मफलों का नाश होता है, तृष्णा की समाप्ति होती है तथा मोक्ष (निर्वाण) का मार्ग प्रशस्त होता है। बुद्ध ने जाति व्यवस्था एवं वर्ण व्यवस्था का विरोध किया।                              

बौद्ध धर्म की शिक्षाएँ 


चार आर्य सत्य बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों की आधारशिला उनके चार आर्य सत्यों (अत्यारि आर्य सत्यानि ) में निहित हैं ये हैं

1. दुःख: - संसार दुःखों का घर है।

2.दुःख समुदाय दुःखों का मूल कारण अज्ञान एवं तृष्णा आदि हैं। यह कार्य-कारण संबंध बताता है।

3.दुःख निरोध:दुःखों का निरोध संभव है तृष्णा एवं अज्ञान का विनाश ही दु:ख निरोध का मार्ग है।

4.दुःख निरोध मार्गः तृष्णा का विनाश अष्टांगिक मार्ग द्वारा सम्भव है। इसे दुःख निरोध गामिनी प्रतिपदा भी कहते हैं।

बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग:


बुद्ध ने दुःखों से मुक्ति व तृष्णा की समाप्ति के लिए 'मध्यम मार्ग' अपनाने को कहा। वे न तो अत्यधिक भोग विलास के पक्षधर थे और न ही शरीर को अत्यधिक कष्ट देने में। इस हेतु उन्होंने अपने मध्यम मार्ग में आठ उपाय बताये इसे ही बुद्ध का अष्टांगिक मार्ग कहते हैं।
यह निम्न हैं- 
1. सम्यक् दृष्टि - चार आर्य सत्यों की सही परख

2. सम्यक् वचन - सत्य बोलना

3. सम्यक् संकल्प - भौतिक वस्तु तथा दुर्भावना का त्याग

4. सम्यक् कर्म - सत्य कर्म करना

5. सम्यक् आजीव - इमानदारी से आजीविका कमाना।

6. सम्यक् व्यायाम - शुद्ध विचार ग्रहण करना।

7. सम्यक् स्मृति - मन, वचन तथा कर्म की प्रत्येक क्रिया के प्रति सचेत रहना।

8. सम्बक समाधि - चित्त की एकाग्रता।

मध्यम प्रतिपदा सिद्धान्त 

बुद्ध द्वारा प्रतिपादित इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य को न तो विलासिता में ही रत रहना चाहिए और न ही अपने शरीर को अत्यधिक कष्ट देना चाहिए, बल्कि उसे शुद्धतापूर्वक नैतिक जीवन व्यतीत करना चाहिए।     
बौद्ध धर्म मूलत: अनीश्वरवादी व अनात्मवादी है। वह सृष्टि का कारण ईश्वर को नहीं मानता है। यह वेदों में विश्वास नहीं करता। अतः यह अवैदिक (Non-Vedic) भी है।

ईश्वर और आत्मा के अस्तित्व में विश्वास न होते हुए भी बुद्ध का पुनर्जन्म में विश्वास था। 

प्रतीत्यसमुत्पाद 


प्रतीत्य का अर्थ है -'इसके होने से' और समुत्पाद का अर्थ है- 'यह उत्पन्न होता है' अर्थात् किसी कारण से कोई बात उत्पन्न होती है। प्रत्येक घटना के पीछे कार्य-कारण का सम्बन्ध है । बौद्ध धर्म में 'कार्य-कारण' का यही सिद्धान्त 'प्रतीत्य-समुत्याद' के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार बौद्ध धर्म में 'कारणवाद' का महत्त्वपूर्ण स्थान है। बौद्ध धर्म में कारण-कार्य की व्याख्या 'द्वादश निदान' में दी गई है। 'द्वादश निदान' को 'प्रतीत्यसमुत्पाद' (अर्थात् एक वस्तु की प्राप्ति होने पर दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है) की संज्ञा दी गई है। द्वादश निदान निम्न हैं

1अविद्या से संस्कार
2 संस्कार से विज्ञान
3 विज्ञान से नामरूप
4 नामरूप से षडायतन
5 षडायतन से स्पर्श
6 स्पर्श से वेदना
7 वेदना से तृष्णा 
8 तृष्णा से उपादान
9 उपादान से भव (संसार में रहने की जिजीविषा)
10 भव से जाति
11 जरा से मरण
12 जाति से जरा

बौद्ध धर्म का प्रधान लक्ष्य था मोक्ष मार्ग का निर्देशन करना, जो मनुष्य को सांसारिक वेदना और कष्ट से मुक्ति दिलाये । बुद्ध कर्म की महत्ता को स्वीकार करते हैं।

बुद्ध के द्वारा सुझाया गया अष्टांगिक मार्ग तार्किक एवं प्रायोगिक नीति दर्शन है। इसी वजह से बौद्ध धर्म को धार्मिक से अधिक 'सामाजिक क्रांति' माना जाता है।                                                                      

बौद्ध धर्म के अन्य सिद्धान्तः

बौद्ध धर्म में निर्वाण का अर्थ है दीपक का बुझ जाना अर्थात् अपनी सभी तृष्णा एवं वेदनाओं का अंत। जो व्यक्ति सभी तृष्णाओं एवं लालसा से दूर है वही चरम शांति का अनुभव कर सकता है।

कर्म सिद्धान्तः

बुद्ध ने जिस दूसरे सिद्धान्त पर काफी बल दिया वह है कर्म का सिद्धांत, इसकी कार्य-प्रणाली एवं पुनर्जन्म । उनके अनुसार वर्तमान एवं आगामी जीवन में मानव की स्थिति उसके अपने कर्म पर निर्भर है। हम अपने ही कर्म-फल प्राप्त के लिए बार-बार जन्म लेते हैं। पापकर्म से निवृत्ति के साथ ही इस जन्म-चक्र से छुटकारा मिल जाता है व मोक्ष की प्राप्ति होती है।

बुद्ध को अज्ञेयवादी कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने ईश्वर को स्वीकार अथवा अस्वीकार नहीं किया। उन्होंने अनेक पेचीदे प्रश्नों जैसे ईश्वर एवं आत्मा की प्रकृति, आस्तित्व आदि में उलझने से इनकार कर दिया। बुद्ध जन्म-मरण एवं पुनर्जन्म के चक्र का मूल कारण अविद्या  (अज्ञान) को बताते हैं।

बौद्ध संघ:

धर्मचक्र प्रवर्तन के बाद महात्मा बुद्ध ने अपने प्रथम पाँच ब्राह्मण शिष्या के साथ धर्म प्रचार हेतु सारनाथ (वाराणसी) में बौद्ध 'संघ' की स्थापना की। संघ चार भागों में विभाजित था-
(1) भिक्षु, (2) भिक्षुणी, (3) सामान्य उपासक,(4) सामान्य उपासिका। 

भिक्षुगण संघ में संगठित थे। संघ की सदस्यता 15 वर्ष से ऊपर की आयु के सभी स्त्री-पुरुषों के लिए खुली थी। परन्तु  निम्न के लिए सदस्यता वर्जित थी- 

(1) कुष्ठ रोगी, क्षय रोगी एवं संक्रामक रोगी
(2) राजा या अन्य व्यक्ति के सेवक
(3) ऋणग्रस्त व्यक्ति
(4) दस्यु एवं अपराधी।

परन्तु इनकी सदस्यता हेतु पुनः विचार संभव था । संघ में प्रवेश से पूर्व माता-पिता की अनुमति अनिवार्य थी। संघ प्रवेश को 'उपसम्पदा' कहा जाता था। बौद्ध भिक्षुओं (परिव्राजकों) को वर्षाऋतु के चार मास एक स्थान पर रहना पड़ता था। इसके उपरान्त सभी भिक्षु एक स्थान पर मिलते थे एवं अपनी भूलों को स्वीकार करते थे एवं साथ ही धर्म चर्चा करते थे। इस उत्सव को 'पवरना' (उपोस्था या उपवस्था ) कहते थे।

संघ में प्रवेश की प्रक्रिया सरल थी। प्रवेश के इच्छुक व्यक्ति को मुण्डन करवाकर पीले वस्त्र धारण कर स्थानीय संघ के प्रमुख के समक्ष त्रिरत्न (बुद्ध, धर्म एवं संघ) के प्रति अपनी वफादारी की शपथ लेनी पड़ती थी। तत्पश्चात उसे 10 शीलों को मानना पड़ता था।

• बौद्ध संघ का संचालन गणतांत्रिक पद्धति पर होता था। प्रारंभ में गौतम बुद्ध संघ में महिलाओं के प्रवेश के विरोधी थे, परंतु बाद में प्रमुख शिष्य आनन्द के बार-बार निवेदन पर उन्होंने महिलाओं के संघ में प्रवेश की अनुमति दी थी तथा उनकी विमाता प्रजापति गौतमी ही पहली भिक्षुणी बनी थी।

महात्मा बुद्ध के प्रमुख शिष्य

आनन्द, सारीपुत्र, मौदगल्यायन, उपाति, सुनीति, देवदत्त, अनुरुद्ध, अनाधपिण्डक, बिम्बसार एवं प्रसेनजित ।                                                            
महात्मा बुद्ध ने बोद्धगया में कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद उनके पास आये दो बंजारों तपस्सू एवं मलिक को अपना शिष्य बनाया। तिब्बत में बौद्ध धर्म को प्रतिष्ठित करने का श्रेय 'पद्मसंभव' को दिया जाता है।                      बुद्ध के वचनों के अपने-अपने तर्क लगाने के आधार पर आगे चलकर बौद्ध सम्प्रदाय के दो प्रधान वर्ग बने
(1) महासांधिक, (2) स्थविरवादी।

महासांधिक यह स्वीकार करते थे कि प्रत्येक व्यक्ति में बुद्धत्व प्राप्ति की स्वाभाविक शक्ति है। स्थविरवादी मानते थे कि बुद्धत्व की प्राप्ति सबको नहीं हो सकती।  

बौद्ध सम्प्रदाय

कालांतर में बौद्ध धर्म 2 सम्प्रदायों में बँट गया।

हीनयान : इसे श्रावकयान भी कहते । यह परम्परावादियों (स्थविरवादियों या थेरवादी), जो बौद्ध धर्म के प्राचीन आदर्शों को बिना किसी परिवर्तन के पूर्ववत् बनाए रखना चाहते थे, का संघ है। इस सम्प्रदाय के अनुयायियों का क्षण भंगुरता में विश्वास था। इस सम्प्रदाय के लोग मगध, ब्रह्मा तथा श्रीलंका में थे। हीनयान की दो शाखायें हो गयी थीं- (1) वैभाषिक (2) सौत्रान्तिक। वैभाषिक मत में जगत् का अनुभव इंद्रियों से होता है। इनके अनुसार सम्पूर्ण संसार तीन भागों में विभक्त है (1) स्कंध (2) आयतन (3) धातु । वैभाषिक को 'बाह्य प्रत्यक्षवाद' भी कहते हैं । वैभाषिक मत पर वसुबन्धु ने अभिधर्म कोश नामक ग्रन्थ लिखा। वैभाषिक सम्यक् ज्ञान को 'प्रमाण' कहते हैं, जो दो प्रकार से होता है- (1) प्रत्यक्ष, (2) अनुमान। इस मत के मुख्य आचार्य वसुमित्र, बुद्धदेव, घोषक आदि थे।

सौत्रान्तिक मत

इनके अनुसार चित्त शुद्ध और निराकार है। चित्त में बाह्य जगत की वस्तुओं के आकार बनते हैं जो बाह्य सत्ता का अनुमान करते हैं। सौत्रान्तिक मत के अनुसार ज्ञान दीपक के समान है जो अपने को स्वयं प्रकाशित करता है। अत: यह चित्त एवं वाह्य जगत दोनों की सत्ता में विश्वास करता है। इसका मुख्य आधार सुत्त पिटक है। हीनयान सम्प्रदाय के सभी ग्रंथ पालि भाषा में लिखे गये हैं।

2. महायान सम्प्रदाय


महासांघिकों से हो कालान्तर में महायान सम्प्रदाय का उदय हुआ। इसे बोधिसत्व ज्ञान भी कहते हैं। महायान का अर्थ है ऐसा वृहत्यान (या उत्कृष्ट मार्ग) जिसके माध्यम से सभी को निर्वाण का सुख प्राप्त हो सके। यह परिवर्तनवादी विचारधारा का समर्थक है, जो बौद्ध धर्म के प्राचीन स्वरूप में समयानुसार परिवर्तन एवं सुधार को महत्व देता है। इसके अनुयायी चीन, जापान, कोरिया, अफगानिस्तान, तुर्किस्तान तथा दक्षिण के अनेक देशों में फैल गए थे यह सम्प्रदाय सेवा व परोपकार पर विशेष बल देता है। इसमें बुद्ध को देवत्व (ईश्वर का अवतार मानकर) प्रदान कर उनकी मूर्तिपूजा की जाने लगी। यह समाज मानव जाति के कल्याण का समर्थक है। इसमें साधकों के लिए चार तीर्थों की स्वीकृति दी गयी, जो बुद्ध के जन्म (लुम्बिनी), सम्बोधि (गया), धर्मचक्रप्रवर्तन (सारनाथ) एवं निर्वाण (कुशीनगर) से सम्बद्ध थे। इस सम्प्रदाय में बुद्ध और बोधिसत्वों की उपसाना की जाती थी। इस सम्प्रदाय के ग्रंथ संस्कृत में लिखे गये। महायानी आत्मा एवं पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। महायान सम्प्रदाय का सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रज्ञा पारमिता सूत्र' है। 

3. व़़ज्रयान: 

यह सम्प्रदाय बौद्ध धर्म का परवर्ती सम्प्रदाय (7वीं सदी में विकसित) था। इस सम्प्रदाय के अनुयायी बुद्ध को अलौकिक शक्तियों वाला पुरुष मानते हैं। उनका मंत्र, हठयोग तथा तांत्रिक क्रिया-कलापों में विश्वास था महायान के विभिन्न तांत्रिक वज्रयान में सम्मिलित हैं। यह सम्प्रदाय तिब्बत एवं चीन में विशेष रूप से प्रचलित हुआ। इस सम्प्रदाय में शक्ति की उपासना की जाती है। इसमें तारा आदि देवियों को महत्त्व प्रदान किया गया है।
                      

 बौद्ध  संगीतियाँ


                                                                                                                              

प्रथम बौद्ध संगीति 483 .पू. (बुद्ध के

निर्वाण के बाद)  

 

अजात शत्रु (हर्यक वंश)

महाकश्यप

विहार स्थित | राजगृह की सप्तपर्णी गुफा

द्वितीय बौद्ध संगीति

383 .पू. (बुद्ध के निर्वाण के 100 वर्ष बाद)  

 

कालांशोक (शिशुनाग

वंश)

 

साबकमीर

चुल्लवग (वैशाली) में

तृतीय बौद्ध संगीति

250 .पू. या 251 .पू

 

अशोक (मौर्य वंश)

मोग्गलिपुत्त तिस्स

पाटलिपुत्र के अशोकाराम विहार में

चतुर्थ बौद्ध संगीति ईसा की प्रथम

शताब्दी

 

कनिष्क (कुषाण वंश)

अध्यक्ष वसुमित्र  उपाध्यक्ष अश्वघोष

कश्मीर के कुण्डलवन में

 

बौद्ध धर्म के उत्थान ( प्रसार ) के कारण

बौद्ध धर्म ईश्वर और आत्मा को नहीं मानता है। इसे हम भारत के धर्मों के इतिहास में एक क्रांति कह सकते हैं। बौद्ध धर्म शुरू में दार्शनिक वाद विवादों के जंजाल में नहीं फंसा था, इसलिए यह सामान्य लोगों को भाया। यह विशेष रूप से निम्न वर्णों का समर्थन पा सका, क्योंकि इसमें वर्ण व्यवस्था व जाति प्रथा की निन्दा की गई है। बौद्ध संघ का दरवाजा हर किसी के लिए खुला रहता था, चाहे वह किसी भी जाति का क्यों न हो। संघ में प्रवेश का अधिकार स्त्रियों को भी था, और इस प्रकार उन्हें पुरुषों की बराबरी प्राप्त होती थी। ब्राह्मण धर्म की तुलना में बौद्ध धर्म अधिक उदार और अधिक जनतांत्रिक था। इसमें ब्राह्मण/वैदिक धर्म के कर्मकाण्डों एवं अंधविश्वासों का कोई स्थान नहीं था। इस कारण यह धर्म शीघ्रता से जन-जन में लोकप्रिय हो गया। इस धर्म के शीघ्र लोकप्रिय बन जाने के निम्नलिखित कारण थे

सरल व व्यावहारिक सिद्धान्त

बौद्ध धर्म के सिद्धान्त सरल, व्यावहारिक, सुबोध एवं गृहस्थ लोगों के अनुकूल थे। बौद्ध धर्म के सिद्धान्त इतने सरल एवं व्यावहारिकता से युक्त थे कि जन-साधारण उन्हें आसानी से अपना सकता था। इन सिद्धान्तों में ऐसी कोई बात नहीं थी जो कष्टसाध्य अथवा दुर्बोध हो। बुद्ध ने अपने दार्शनिक विचारों का प्रतिपादन न कर शुद्ध आचरण पर अधिक जोर दिया था। वस्तुतः उनके सिद्धान्त नैतिक जीवन व्यतीत करने की रीति-नीति को स्पष्ट करते थे। ऐसी स्थिति में जनता का गूढ़ रहस्यवाद तथा जटिल वैदिक धर्म से हटकर इस धर्म की ओर आकर्षित होना स्वाभाविक ही था।

अनुकूल वातावरण

बौद्ध धर्म का उदय उस समय में हुआ था, जब भारतीय जनता प्रचलित ब्राह्मण धर्म की रूढ़िवादिता, कर्मकाण्ड, रहस्यवाद और उनके पुजारी-पुरोहितों के आचरण से क्षुब्ध थी। जनता यज्ञों एवं वैदिक कर्मकाण्डों का विरोध करने लगी थी। ऐसे दोषपूर्ण एवं जटिलतायुक्त धार्मिक वातावरण में जब गौतम बुद्ध ने प्रचलित व्यवस्था का खण्डन कर जीवन को उन्नत करने के लिए सरल एवं व्यावहारिक तरीकों को बताया जो आडम्बर एवं कर्मकाण्डों से पूर्णतः मुक्त थे, जनता ने उनका हृदय से स्वागत किया। 

जन-भाषा का प्रयोग


महात्मा बुद्ध ने अपने उपदेशों का प्रचार उस युग की जन-भाषा पालि में किया था। साथ ही महात्मा बुद्ध द्वारा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु अपनाई गई शैली अत्यंत ही सरल व रोचक थी। अत: जनसाधारण उनकी बात को आसानी से समझ लेता था। ऐसी स्थिति में जनता पर उनके उपदेशों का अनूकूल प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। इस कारण महात्मा बुद्ध के उपदेश शीघ्र ही जनप्रिय हो गये।

सामाजिक समानता का सिद्धान्त

महात्मा बुद्ध ने जाति-पाति का घोर विरोध कर समानता, नैतिकता व स्वतन्त्रता पर विशेष बल दिया और जाति प्रथा को निरर्थक प्रमाणित किया, जबकि ब्राह्मण धर्म में समाज के निम्न वर्ग के लोगों का कोई स्थान न था और उनका तिरस्कार किया जाता था। जातिगत भेदभाव के ऊपर उठकर सबको समान रूप से मोक्ष का अधिकारी मानना बौद्ध धर्म की सफलता का एक मुख्य कारण था। वैदिक व्यवस्था की जटिलता से निम्न जातियों को तो मोक्ष की आशा नहीं थी और अन्य जातियों के निर्धन लोग भी मोक्ष का विचार नहीं कर सकते थे, क्योंकि याज्ञिक-अनुष्ठानों को सम्पन्न करने के लिए आवश्यक धन उनके पास नहीं था। 
अत: उच्च वर्ग के साथ ही निम्न वर्ग के लोग भी इस धर्म के अनुयायी हो गए और बौद्ध धर्म शीघ्र ही सर्वत्र प्रचलित हो गया।

बुद्ध का व्यक्तिवः 

बौद्ध धर्म की लोकप्रियता एवं उसके द्रुतगामी प्रसार का एक मुख्य कारण महात्मा बुद्ध का आकर्षक व्यक्तित्व था। राजकुमार होते हुए भी सभी सुख-सुविधाओं के त्याग ने स्वाभाविक रूप से उनके व्यक्तित्व को ऊँचा उठा दिया था। बुद्ध के व्यक्तित्व और धर्मोपदेश करने की उनकी प्रणाली दोनों ही बौद्ध धर्म के प्रचार में सहायक हुए। वे भलाई करके बुराई को भगाने तथा प्रेम करके घृणा को भगाने का प्रयास करते थे। निन्दा और गाली से उन्हें क्रोध नहीं होता था। कठिन स्थितियों में भी वे धीर और शान्त बने रहते थे, और अपने विरोधियों का सामना चातुर्य और प्रत्युत्पन्न मति से करते थे। इसके अलावा महात्मा बुद्ध ने कभी भी किसी अन्य धर्म का अनादर या बुराई नहीं की। वे अपने तर्कों के आधार पर प्रतिपक्षी धर्म का खण्डन करते थे, इससे उनके उपदेशों के प्रति जनसाधारण का श्रद्धावान होना स्वाभाविक था। 

प्रबल प्रतिद्वन्द्विता का अभाव

बौद्ध धर्म के शीघ्र और व्यापक प्रसार का एक महत्त्वपूर्ण कारण उस युग में उसका विरोध करने वाली धार्मिक विचारधाराओं अर्थात् धार्मिक सम्प्रदायों का अभाव भी था। वैदिक धर्म में प्रचार की प्रवृत्ति नहीं थी और उस युग में जनसाधारण को वैदिक धर्म से अरुचि होने लगी थी। जैन मत के सिद्धान्तों में शारीरिक क्लेश की प्रधानता होने के कारण भी वह अधिक लोकप्रिय नहीं बन पाया। ऐसी स्थिति में बौद्ध प्रचारकों को बिना विरोध के अपने धर्म का प्रचार करने में सफलता मिल गई। फलस्वरूप अधिकाधिक लोग इससे जुड़ते चले गये।

बौद्ध संघ: 


महात्मा बुद्ध इस तथ्य से भलीभांति परिचित थे कि किसी भी धर्म का विकास तभी संभव है, जब उसका सुदृढ़ संगठन हो। अतः महात्मा बुद्ध ने अपनी शिक्षाओं एवं धर्म के प्रचार हेतु बौद्ध भिक्षुओं के लिए संघ की स्थापना की, जिसमें हर किसी को जाति, लिंग या आर्थिक स्तर के भेदभाव के बिना प्रवेश की अनुमति थी। उसके संघों की जीवन-प्रणाली जनतन्त्रात्मक होने के साथ-साथ संघीय भावना को लिए हुए थी। संघों में रहने वाले सभी भिक्षुगण एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाकर बुद्ध के उपदेशों का प्रचार करते हुए संगठित रूप में त्याग, सदाचार, अध्यवसाय और अध्ययनशीलता के उत्तम गुणों का परिचय देते थे। साथ ही, वे प्रत्येक प्रकार की कठिनाई और आपत्ति का सामना करने को तत्पर रहते थे। इनके फलस्वरूप बौद्ध धर्म के शीघ्र प्रसार को प्रोत्साहन मिला।

राजकीय सरंक्षण

राजकीय संरक्षण प्राप्त होने के कारण बौद्ध धर्म की अत्यधिक उन्नति सम्भव हो सकी। अनेक शासकों यथा बिम्बिसार, प्रसेनजित, प्रद्योत, अशोक, कनिष्क, मिलिन्द, हर्षवर्धन आदि ने इस धर्म को राजकीय प्रश्रय प्रदान किया। कुछ शासकों ने तो बौद्ध धर्म को राज्य धर्म घोषित कर दिया और उसके प्रचार एवं विकास में राजकीय शक्तिको लगा दिया। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए धार्मिक महामात्रों की नियुक्ति की तथा स्तूप एवं स्तम्भों का निर्माण करवाया जिन पर महात्मा बुद्ध के उपदेश खुदवाए तथा बौद्ध धर्म के प्रचार हेतु विदेशों में प्रचारक भेजे। यही कारण है कि बौद्ध धर्म की अत्यधिक उन्नति हुई।

इसके अलावा उस समय के सम्पन्न कबीलों- शाक्य, लिच्छवी, मल्ल, कोलीय, मोरीय आदि गणराज्यों के सम्पन्न लोगों ने बुद्ध धर्म में अत्यधिक रुचि ली। इसके साथ ही विद्वान व व्यापारियों ने इस धर्म को अपनाया एवं तन, मन, धन से इसके प्रचार सहायता को। फलस्वरूप जनसाधारण में यह धर्म  तीव्र गति से फैला। राज्याश्रय, धनिक वर्ग व विद्वानों का सहयोग मिलने से यह धर्म भारत और विदेशो में खूब फैला

बौद्ध संगीतियों का आयोजन

समय-समय पर संगीतियों ने बौद्ध धर्म की उन्नति में विशेष योगदान दिया। इन संगीतियों में बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों पर समय-समय पर विचार-विमर्श किया गया तथा आवश्यकता पड़ने पर बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों का सरलीकरण किया गया साथ ही बौद्ध ग्रन्थों की रचना हुई परिणामस्वरूप बौद्ध धर्म की उन्नति हुई। 

साहित्य की प्रचुरता

किसी भी धर्म की उन्नति में साहित्य का विशेष योगदान होता है, क्योंकि साहित्य को पढ़कर तथा उस पर विचार कर संबंधित धर्म के सार को आसानी से समझा जा सकता है। चूंकि बौद्ध साहित्य का प्रचुरता में सृजन किया गया, अत: अपार जनसमुदाय बौद्ध साहित्य को पढ़कर तथा समझकर इसको अपनाने लगा। बौद्ध धर्म ने न केवल भारतीय वरन् विदेशियों को भी अपनी ओर आकर्षित किया। यही कारण है कि समय-समय पर अनेक विदेशी यात्री भारत आए। उन्होंने यहाँ आकर बौद्ध साहित्य का अध्ययन किया और फिर बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार में अपना योगदान दिया।

विदेशों में प्रसार


यद्यपि भारत में बौद्ध धर्म समय की गति के अनुसार उठता गिरता रहा, किन्तु अपने जन्म के बाद से लेकर छठी शताब्दी ईसवी तक बौद्ध भिक्षुओं तथा कुछ भारतीय सम्राटों के प्रयत्नों से यह धर्म मध्य एशिया, चीन, तिब्बत, जापान, बर्मा, दक्षिण-पूर्वी एशिया तथा यूनान तक फैल गया।

बौद्ध धर्म के विदेशों में प्रचार का कार्य विधिवत् रूप में बुद्ध की मृत्यु के लगभग 200 वर्ष बाद मौर्य सम्राट अशोक के काल में प्रारंभ हुआ। अशोक ने इस धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए श्रीलंका, बर्मा, मध्य एशिया तथा पश्चिमी एशिया आदि में अपने प्रचारक भेजे। विदेशों में बौद्ध धर्म के प्रचार में इस धर्म की महायान शाखा का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा और महायान विचारधारा के अनुयायी सम्राट कनिष्क के प्रयत्नों से मध्य एशिया, तिब्बत, चीन तथा जापान तक इस धर्म का खूब प्रचार हुआ। कई बौद्ध विद्वान चीन गये और उन्होंने चीनी भाषा में बौद्ध ग्रन्थों का अनुवाद किया। विद्वानों का कथन है कि चीन से बौद्ध धर्म कोरिया, मंगोलिया, फारमोसा, तथा जापान में फैला।

उपर्युक्त सभी कारणों के साथ-साथ बौद्ध धर्म के लचीलेपन ने भी इसके विस्तार एवं उन्नति में योगदान दिया। बौद्ध धर्म में समय की माँग के अनुसार परिवर्तन होते रहे। धर्म की कठोरता को त्यागकर इसमें उदारवादी महायान विचारधारा का प्रादुर्भाव हुआ, जिसने इस धर्म के देश-विदेश में व्यापक प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया। 
                                            

बौद्ध धर्म की अवनति के कारण 


देश में बौद्ध धर्म का जिस तीव्र गति से प्रचार -प्रसार हुआ था, ईसा की 12वीं शताब्दी के आते-आते, उसी तीव्र गति से यह धर्म भारत भूमि से विलुप्त होता चला गया। 12वीं सदी में भारत में इस धर्म के अनुयायियों की संख्या नाममात्र की रह गई। बौद्ध धर्म की अवनति गुप्तकाल से ही प्रारंभ हो गई थी। आज तो यह स्थिति है कि भारत का माने जाने वाला यह प्रमुख धर्म भारत में हो विलुप्त हो गया है। इस धर्म की अवनति के निम्न कारण हैं

बौद्ध धर्म का परिवर्तित स्वरूप

जिस बौद्ध धर्म का प्रतिपादन महात्मा बुद्ध ने किया था वह अत्यन्त ही सरल एवं व्यावहारिक था, किन्तु समय के साथ बौद्ध धर्म में जटिलता एवं कट्टरता का समावेश हो गया और इस का मौलिक स्वरूप ही बदल गया । कालक्रमेण यह धर्म भी उन्हीं कर्मकाण्डों एवं अनुष्ठानों के जाल में जकड़ गया, जिनकी वह आरंभ में निन्दा करता था और जिसकी वजह से जनसामान्य इसकी ओर आकर्षित हुआ था। बौद्ध धर्म में उत्पन्न होने वाली अनेक कुरीतियों ने जनसाधारण को त्रस्त कर दिया। अतः अब जनसाधारण इस धर्म से विमुख हो चला और धीरे-धीरे बौद्ध धर्म के अनुयायियों में घटोतरी होने लगी। कालांतर में महात्मा  बुद्ध को ईश्वर का अवतार मानकर उनकी मूर्तियाँ बनने लगी और उनकी विविध पद्धतियों से पूजा-अर्चना होने लगी। फलस्वरूप इस धर्म की नवीनता व सुधारवादी प्रवृत्ति समाप्त हो गई, जिससे लोगों का इस पर से विश्वास उठ गया।

राजकीय संरक्षण की समाप्ति

मौर्य वंश की समाप्ति के बाद बौद्ध धर्म को राजकीय संरक्षण मिलना बन्द हो गया। मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग तथा कण्व और सातवाहन नरेशों ने वैदिक धर्म (ब्राह्मण धर्म) को समर्थन दिया। कनिष्क के समय में बौद्ध को पुन: राज्याश्रय प्राप्त हुआ। परन्तु गुप्त वंश ने पुन: हिन्दू धर्म को संरक्षण देकर उसे प्रोत्साहित किया। गुप्तवंशीय नरेशों ने वैदिक यज्ञों को भी पुन: प्रतिष्ठा प्रदान की। दक्षिण भारत में चालुक्य नरेशों ने हिन्दू धर्म को राजकीय संरक्षण प्रदान किया। अतः जनता भी हिन्दू धर्म की ओर अग्रसर हुई। इस प्रकार जिस राजकीय संरक्षण ने ही इस धर्म की तीव्र उन्नति में महती योगदान दिया था, उसी राजकीय संरक्षण के अभाव ने इस धर्म को विलुप्त होने में सहयोग किया। 
कहा जाता है कि ब्राह्मण शासक पुष्यमित्र शुंग ने बौद्धों को सताया। सताए जाने के कई उदाहरण ईसा की छठी-सातवीं सदियों में मिलते हैं। शैव सम्प्रदाय के हूण राजा मिहिरकुल ने सैंकड़ों बौद्धों को मौत के घाट उतारा ।

गोड़ देश के शिवभक्त शासक शंशाक ने  बौद्ध  गया मे  उस   बोधिवृक्ष  को   काट डाला  जिसके नीचे  बुद्ध को ज्ञान मिला । ह्वेन त्सांग ने लिखा है कि 600 स्तुप और विहार तोड़ डाले गए और हमारी भिक्षुओं और उपासकों को मार डाला गया।

बौद्ध धर्म में विकृतियाँ एवं नैतिक पतन

मौर्यकाल के बाद बौद्ध धर्म में कई विकृतियाँ घर कर गई। धीरे धीरे बौद्ध भिक्षु जनजीयन की मुख्यधार से कटते गये। उन्होंने जनसामान्य की भाषा 'पालि' को छोड़ दिया और संस्कृत को अपना लिया जो केवल विद्वानों की भाषा थी । वे बड़ी मात्रा में मूर्ति पूजा करने लगे तथा चढ़ावा आदि लेने लगे । इनके अलावा बौद्ध विहारों को राजाओं व धनिकों से भारी मात्रा में दान मिलता था इस सबके परिणामस्यरूप बोद्ध का जीवन सुखमय एवं विलासी हो गया। सातवीं सदी के आते-आते बौद्ध विहारों पर विलासी भिक्षुओं का प्रभुत्व हो गया। विहारों में अपार सम्पति एवं महिलाओं का प्रवेश होने से वे [कुक्मों के केन्द्र बन गये। बौद्ध भिक्षु नारी को भोग की वस्तु समझने लगे इससे धीरे-धीरे यह धर्म अपनी प्रतिष्ठा खोता गया।

बौद्ध धर्म का विभाजन: 


बुद्ध की मृत्यु के बाद से ही बौद्ध भिक्षुओं में आन्तरिक मतभेद उत्पन्न हो गये और वे हीनयान तथा महायान में बँट गये। इसके बाद उनमें स्थविरवाद और महासांधिक सम्प्रदायों का विकास हुआ। अशोक ने बौद्ध धर्म में एकता बनाए रखने का अथक प्रयास किया और उसे कुछ सफलता भी मिली। परन्तु बाद में इन विभिन्न शाखाओं में जबरदस्त संघर्ष शुरू हो गया और वे एक-दूसरे की बुरी तरह से निन्दा करने लगे। उनके इस आपसी संघर्ष ने युद्ध धर्म की लोकप्रियता को भारी नुकसान पहुँचाया।

हिन्दू-धर्म में सुधार

बौद्ध धर्म के उत्थान के समय हिन्दुओं को अपने धर्म में व्याप्त होने वाली त्रुटियों का आभास हुआ अत: उन्होंने हिन्दू धर्म में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म में अनेक सुधार हुए। शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट तथा रामानुज आदि कुछ ऐसे दार्शनिक हुए जिन्होंने हिन्दू धर्म के दोषों को दूर किया। अब हिन्दू धर्म ने एक बार पुनः लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। इस तरह हिन्दू धर्म में सुधार . होने के कारण बौद्ध धर्म के गौरव को भारी क्षति पहुँची।

विदेशी आक्रमण

गुप्तों के बाद विदेशी हूणों के आक्रमणों ने अहिंसावादी बौद्ध धर्म पर घातक प्रहार किया। हूणों के नेता मिहिरकुल ने बौद्ध मठों एवं विहारों को निर्दयता से नष्ट कर दिया। हणों ने हजारों की संख्या में बौद्ध भिक्षुओं का कत्लेआम किया। विहारों में अपार सम्पत्ति को देखकर मुस्लिम हमलावरों की ललचाई नजर उन पर पड़ी। ये विहार उन लोभी हमलावरों के विशेष लक्ष्य हो गए। तुर्को ने नालन्दा में असंख्य बौद्ध भिक्षुओं का संहार किया और कुछ भिक्षु जान बचाकर नेपाल और तिब्बत भाग गए।

उनके मठों और विहारों को भूमिसात किया गया और नालन्दा जैसी शिक्षण संस्थाओं को भी जलाकर राख कर दिया। इससे इन प्रदेशों से भी बौद्ध धर्म का प्रभाव जाता रहा। ऐसी स्थिति में सामान्य बौद्ध गृहस्थ पुनः हिन्दू धर्म में आ गये।

संघ में स्त्रियों का प्रवेश

बौद्ध  धर्म अवनति का एक मुख्य कारण संघ में स्त्रियों का प्रवेश था। स्वयं महात्मा बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द को कहा था कि तुम्हारे विशेष आग्रह पर में स्त्रियों को संघ में प्रवेश करने का अधिकार तो दे रहा हूँ, परन्तु अब यह धर्म 500 वर्षों से अधिक नहीं पनप पायेगा भिक्षु एवं भिक्षुणियों के एक साथ रहने से संयम का संतुलन बिगड़ गया और मठों एवं विहारों का शुद्ध एवं सात्विक वातावरण व्यभिचार एवं विलासिता में बदल गया। इससे उनकी प्रतिष्ठा गिर गई। वज्रयान सम्प्रदाय ने बौद्ध धर्म को वाम मार्ग की ओर धकेल कर उसकी रही-सही प्रतिष्ठा को भी में मिला दिया।

सामाजिक कारण

बौद्ध धर्म ने लोगों को मोक्ष प्राप्ति का एक नवीन मार्ग तो बतला दिया परन्तु वह अपने अनुयायियों के लिए दैनिक सामाजिक व्यवस्था सम्बन्धी रीति-रिवाज अथवा संस्कार नहीं बना पाया।

परिणामस्वरूप लाखों लोग बौद्ध धर्म के अनुयायी बन जाने के बाद भी सामाजिक अवसरों पर हिन्दू संस्कारों का पालन करते रहे । उदाहरणार्थ; जन्म, विवाह, मृत्यु आदि अवसरों के लिए उन्हें हिन्दू रीति-रिवाजों का ही पालन करना पड़ता था। इस दृष्टि से बौद्ध धर्म के अनुयायी हिन्दू धर्म से कभी अधिक दूर नहीं जा पाये थे अत: जब बौद्ध धर्म का अवसान शुरू हुआ तो उन्हें पुन: हिन्दू धर्म अपनाने में कोई कठिनाई नहीं हुई।

उक्त सभी कारणों के सम्मिलित प्रभाव से बौद्ध धर्म 12वीं सदी तक अपनी जन्म भूमि से लुप्त प्रायः हो गया।        

बौद्ध साहित्य: 

बौद्ध साहित्य पाली भाषा में लिखा गया है। बौद्ध साहित्य में त्रिपिटक महत्त्वपूर्ण हैं। ये हैं-

1. सुत्तपिटक (धर्म -सिद्धान्त)

बौद्धधर्म के सिद्धान्तों और बुद्ध के उपदेशों का वर्णन। यह पाँच भागों में विभक्त है-

1 दीर्घ निकाय, 2. मज्झिम निकाय, 3. संयुक्त निकाय, 4. अंगुतर निकाय एवं 5. खुद्दक निकाय।

2. अभिधम्म पिटक (आचार नियम) 

बौद्ध धर्म का आध्यात्मिक व दार्शनिक विवेचन, जिसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ 'कथा वत्थु' है जिसकी रचना मोग्गलिपुत्र तिस्स ने की

3. विनय पिटक


भिक्षु-भिक्षुणियों के संघ व उनके दैनिक जीवन आचरण सम्बन्धी नियमों का वर्णन। इसके तीन भाग हैं- विभंग, खन्दक व परिवार।

अन्य प्रमुख बौद्ध ग्रंथ 

ललित विस्तार : महायान सम्प्रदाय के इस ग्रंथ में महात्मा बुद्ध के जीवन का उल्लेख मिलता है। इस ग्रंथ का उपयोग सर एडविन आरनॉल्ड ने The Light of Asia की रचना में किया, जिसका हिन्दी अनुवाद आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'बुद्धचरित' नाम से किया।                                                   

जातक कथाएँ 

पालि भाषा में रचित इन कथाओं में बुद्ध के पूर्व जन्म की कथाएँ एवं बुद्ध द्कालीन धार्मिक, सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का वर्णन मिलता है। भारतीय कथा साहित्य का यह प्राचीनतम संग्रह है।

मिलिन्दपन्हो 

प्रथम शताब्दी ई.पू. में नागसेन कृत पालि भाषा में रचत इस ग्रंथ में यूनानी शासक मिलिन्द (मीनेण्डर) और बौद्ध भिक्षु नागसेन के मध्य दार्शनिक विषय को लेकर हुए वाद-विवाद का वर्णन किया गया है।

महाविभाष - संस्कृत भाषा में वसुमित्र द्वारा रचित बौद्ध ग्रंथ 

महावस्तु 

संस्कृत में भाषा में रचित इस ग्रन्थ में बुद्ध की अद्भत शक्ति तथा बोधिसत्व की प्रतिष्ठा का वर्णन है। 

दीपवंश 

पालि भाषा में इस ग्रंथ की रचना श्रीलंका में की गई इसमें तत्कालीन भारत की सामाजिक, धार्मिक व राजनीतिक दशा तथा श्रीलंका के राजवंशों का वर्णन किया गया है

महावंश : 5वीं सदी में श्रीलंका में रचित इस ग्रंथ का लेखक महानाम था।   

अट्ठकथा: इनकी रचना त्रिपिटकों पर भाषा एवं व्याख्या के रूप में की गई हैं अट्ठकथा पालि भाषा में है। बुद्धघोष ने पाँचवीं सदी में सिंहल देश (लंका) में अनेक अट्ठकथाओं की रचना की थी।

दिव्यावदान बौद्ध साहित्य के इस ग्रंथ में परवर्ती मौर्य शासकों एवं शुंगवंशी पुष्यमित्र शुंग का उल्लेख मिलता है

सारिपुत्र प्रकरण : यह अश्वघोष द्वारा रचित नाटक ग्रंथ है, जो संस्कृत में लिखा गया है।

बुद्धचरित तथा सौन्दरानन्द : अश्वघोष द्वारा संस्कृत भाषा में लिखे गए ग्रंथ ।

धम्मपद इसे बौद्ध धर्म की 'गीता' कहते हैं। 

बुद्धवंश : इस पद्यमयी रचना में 24 पूर्ववर्ती बुद्धों एवं गौतम बुद्ध की कथा है।
कथावत्थु : तृतीय बौद्ध संगीति के बाद मोगलिपुततिस्स ने इस ग्रंथ की रचना की थी। इसमें सभा में हुए सभी वाद-विवाद का वर्णन है
उपादान इसमें विशिष्ट बौद्धों के चरितों का वर्णन पद्यमय है।

महत्त्वपूर्ण तथ्यः


बोरोबुदूर का बौद्ध स्तूप जो विश्व का सबसे विशाल तथा अपने प्रकार का एक मात्र स्तूप है, का निर्माण शैलेन्द्र राजाओं ने मध्य जावा इण्डोनेशिया में कराया।
बुद्ध के 'पंचशील सिद्धान्त' का वर्णन छान्दोग्य उपनिषद् में मिलता है। 
भारतीय दर्शन में तर्कशास्त्र की प्रगति बौद्ध धर्म के प्रभाव से हुई। बौद्ध दर्शन में शून्यवाद तथा विज्ञानवाद की जिन दार्शनिक पद्धतियों का उदय हुआ उसका प्रभाव शंकराचार्य के दर्शन पर पड़ा। यही कारण है कि शंकराचार्य को कभी-कभी प्रच्छन्न बौद्ध भी कहा जाता है। 
बौद्ध धर्म की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण देन भारतीय कला एवं स्थापत्य के विकास में रही। साँची, भरहुत, अमरावती के स्तूपों तथा अशोक के शिला स्तम्भों, कार्ले की बौद्ध गुफाएँ (पुणे, महाराष्ट्र), अजन्ता-ऐलोरा गुफाएँ ( महाराष्ट्र ), बाघ गुफाएँ ( मध्य प्रदेश ) तथा बाराबार एवं नागार्जुनी की गुफाएँ (बिहार) बौद्ध कालीन स्थापत्य कला एवं चित्रकला के श्रेष्ठतम आदर्श हैं।

बुद्ध के अस्थि अवशेषों पर भट्टि (द. भारत) में निर्मित प्राचीनतम स्तूप को महास्तूप की संज्ञा दी गई है।

गान्धार शैली के अन्तर्गत ही सर्वाधिक बुद्ध मूर्तियों का निर्माण किया गया।
सम्भवतः प्रथम बुद्ध मूर्ति मथुराकला के अन्तर्गत बनी।
पूना (महाराष्ट्र) स्थित कार्ले की अधिकांश बौद्ध गुफाएँ एवं कौल्वी की गुफाएँ (झालावाड़, राजस्थान ) हीनयान सम्प्रदाय की कला का अनोखा उदाहरण हैं। कुछ महासांघिक (महायान) सम्प्रदाय की भी है।

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