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भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गाँधी का योगदान

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गाँधी का योगदान

प्रथम महायुद्ध के बाद भारतीय स्वतंत्रता संग्राम एवं राजनीति में अनेक गुणात्मक परिवर्तन आये। महात्मा गाँधी ये गुणात्मक परिवर्तन करने वाले राष्ट्रीय नेताओं में अग्रणी थे। 1919 के बाद स्वतंत्रता प्राप्ति तक महात्मा गाँधी भारत के स्वतंत्रता आन्दोलन एवं राजनीति में सर्वप्रमुख नेता बने रहे। महात्मा गाँधी (प्रारम्भिक नाम मोहनदास करमचन्द गाँधी था) जन्म 2 अक्टूबर, 1869 ई. को पोरबन्दर (काठियावाड़, गुजरात) में पिता करमचन्द उत्तमचन्द गाँधी के घर हुआ। उनके पिता पोरबन्दर एवं राजकोट के दीवान थे। सन् 1888 ई. में 19 वर्ष की आयु में वे वैरिस्ट्री करने (कानून की शिक्षा प्राप्त करने) इंग्लैण्ड गये तथा सन् 1891 ई. में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। महात्मा गाँधी के व्यक्तित्व का विकास एक चैरिस्टर (वकील) के रूप में प्रारम्भ हुआ। उनके व्यक्तित्व के निर्माण में उनके सन् 1893 से सन् 1914 तक के दक्षिणी अफ्रीका के प्रवास का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गाँधी का योगदान (Gandhi ji's Contribution to Indian Freedom Movement) 

महात्मा गाँधी सन् 1893 में एक भारतीय केस के सिलसिले में पैरवी करने हेतु बैरिस्टर के रूप में पहली बार दक्षिणी अफ्रीका गये। वहाँ की श्वेत सरकार के नस्ल भेदवादी रवैये व नस्ल के आधार पर अश्वेतों पर अनेको प्रतिबन्ध एवं अत्याचारों ने गाँधीजी के मन को उद्वेलित कर दिया। गाँधीजी ने वहाँ 'सत्याग्रह' (सत्य एवं अहिंसा पर आधारित विरोध प्रदर्शन की नीति) का प्रयोग कर वहां के अश्वेतों, विभिन्न समुदाय के लोगों एवं भारतीयों को संगठित कर सरकारी नीतियों का व्यापक विरोध किया। इन्हें कुछ सफलताएँ भी हासिल हुई। उनके साथ इस प्रयोग में सभी धर्मों एवं सम्प्रदायों के लोग शामिल हुए। दक्षिणी अफ्रीका में इसी राजनीतिक प्रयोग के कारण गाँधीजी को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्धि प्राप्त हुई।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गाँधी का योगदान
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में महात्मा गाँधी का योगदान 


गांधीजी 9 जनवरी, 1915 को दक्षिण अफ्रीका से एक महान विजेता के रूप में स्थायी रूप से भारत वापस आ गये। वहाँ किये गये रचनात्मक प्रयोगों व अनुभवों के कारण गाँधीजी के व्यक्तित्व में अनेक सकारात्मक परिवर्तनों का आविर्भाव हो चुका था। इन प्रयोगों से उन्हें भारत में भी पर्याप्त प्रसिद्धि मिल चुकी थी।

महात्मा गाँधी ने भारत आने के बाद अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह से भारत को वास्तविक स्थिति का ज्ञान प्राप्त करने हेतु कुछ समय शांतिपूर्ण ढंग से व्यतीत करने का निश्चय किया गाँधीजी ने स्वदेश लौटने के बाद सर्वप्रथम सम्पूर्ण देश का भ्रमण किया। उनका आम भारतीयों को तरह रहना सहना, बोलना चालना, आचार विचार, सर्वधर्म समभाव एवं नैतिकता के प्रति गहरी आस्था जैसी उनकी खूबियों ने उनकी जनता के बीच गहरी पैठ बना दी। उन्होंने अहमदाबाद (गुजरात) के निकट साबरमती के पास मई, 1915 में अपना आश्रम 'साबरमती आश्रम' स्थापित किया।

गाँधीजी ने भारत में अपना राजनीतिक जीवन प्रारंभ से सन् 1918 तक अंग्रेजों के सहयोगी के रूप में शुरू किया। उस समय तक उन्हें अंग्रेजों की न्यायप्रियता में पूरा विश्वास था उस समय प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था। अत: गांधीजी ने गवर्नर जनरल एवं वायसराय को अपनी सेवाएं देने का प्रस्ताव भेजा। उसी वर्ष उन्होंने भारतीयों के एक 'स्वैच्छिक एंबुलेंस दल' गठित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। युद्ध की परिस्थिति में गांधीजी ने देशवासियों से सरकार को सहयोग करने का आह्वान किया। प्रथम विश्वयुद्ध में सहयोग के कारण ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 'केसर-ए-हिन्द' की उपाधि प्रदान की। परन्तु दूसरी ओर महात्मा गांधी अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर किये जा रहें  स्थानीय अन्यायों के विरुद्ध निरपेक्ष नहीं रहे। बल्कि उनका व्यापक विरोध करते रहे। भारत आगमन के बाद के दूसरे वर्ष के बाद वे सक्रिय रूप से इन अन्यायों के विरुद्ध उठ खड़े हुए। गाँधीजी ने इस दौरान भारतीय राजनीति में एक महत्त्वपूर्ण एवं प्रभावी परिवर्तन कि-नीचे के स्तर के स्थानीय मुद्दों को उठाकर नीचे से राजनीति को सफल बनाकर उसे अखिल भारतीय स्वरूप प्रदान करने का किया

गाँधीजी द्वारा प्रारंभिक वर्षों में किये गये आन्दोलन

(1) गिरमिटिया प्रथा की समाप्ति-

महात्मा गाँधी का भारत आगमन के बाद राजनीतिक क्षेत्र में सर्वप्रथम कार्य अंग्रेजी उपनिवेशों की सहायतार्थ भारतीय मजदूरों की भर्ती करने की घृणित 'गिरमिटिया प्रथा के विरुद्ध सशक्त आवाज उठाना तथा उसे पूरी तरह समाप्त करवाना था। गाँधीजी को भारत में लोकप्रियता उनके द्वारा प्रारंभ किये गये निम्न तीन सफल जनआंदोलनों के कारण मिली।

( 1 ) चम्पारण आंदोलन-

महात्मा गाँधी ने भारत में सबसे पहला एवं महत्त्वपूर्ण आन्दोलन बिहार के चम्पारन क्षेत्र में किया। इस क्षेत्र में यूरोपीय नील उत्पादकों द्वारा स्थानीय किसानों का अंतहीन शोषण किया जा रहा था। राजकुमार शुक्ल द्वारा कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन (1917) में गाँधीजी को चम्पारण के नील किसानों की समस्याओं से अवगत कराया गया एवं उन्हें एक बार उनकी समस्याओं को सुनने हेतु वहाँ भ्रमण करने का आग्रह किया। गाँधीजी कुछ समय बाद जाँच हेतु चम्पारन क्षेत्र में गये परन्तु चम्पारण के जिलाधिकारी ने उन्हें अतिशीघ्र वहाँ से वापस चले जाने का आदेश दिया। गाँधीजी ने इस आदेश को मानने से इन्कार कर दिया। अन्ततः बिहार सरकार के प्रयासों से उन्हें वहाँ जाँच करने की अनुमति मिल गई। गाँधीजी ने जुलाई, 1917 में एक खुली जाँच बैठाई एवं चम्पारन के किसानों की शिकायतों को सारे देश के सम्मुख प्रस्तुत किया। अंतत: अंग्रेज सरकार ने श्वेत नील प्लांटरों द्वारा किसानों पर की जा रही ज्यादतियों को शिकायत को स्वीकार कर लिया फलतः चम्पारण में 'तीनकठिया पद्धति' को समाप्त कर दिया गया।

इस प्रकार गाँधीजी को भारत में अपने पहले आंदोलन में ही सफलता हाथ लग गई। गाँधीजी के प्रयासों से 1917 के अंत तक वहाँ 'सारावेसी' (या शहरबेसी लगान की बढ़ी हुई दरें) की दरों को भी घटा दिया गया था।

अहमदाबाद के श्रमिकों का आन्दोलन- 

अहमदाबाद उनीसवीं सदी के अन्त में एक औद्योगिक केन्द्र के रूप में विकसित होने लगा था। 1917 ई. में यहाँ के मिल मालिकों ने मजदूरों को दिया जा रहा प्लेग बोनस बन्द करने का निर्णय लिया। इसके विपरीत बाजार में वस्तुओं की कीमतें बढ़ती जा रही थी। श्रमिकों ने प्लेग बोनस समाप्त करने के एवज में उनकी मजदूरी में 50 में प्रतिशत वृद्धि करने की माँग की जबकि मालिक 20 प्रतिशत वृद्धि पर हो राजी हुए। फलतः मिल मजदूरों ने महात्मा गाँधी से सहायता एवं मार्गदर्शन का आग्रह किया। फरवरी-मार्च, 1918 में गाँधीजी ने मिल मालिकों एवं मजदूरों के बीच मध्यस्थता करना प्रारंभ किया। गांधीजी के कहने पर हड़ताल की गई परंतु शीघ्र ही स्थिति ने विकट रूप धारण कर लिया। फलस्वरूप गाँधीजी ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम ऐतिहासिक भूख हड़ताल प्रारंभ की। अंततः गाँधीजी के प्रयासों से मिल मालिक मजदूरों को मजदूरी में 35 प्रतिशत वृद्धि देने के लिए राजी हो गये। इसके बाद गाँधीजी ने श्रम-विवादों को शान्तिपूर्ण ढंग से निपटाने तथा श्रमिकों में चेतना उत्पन्न करने हेतु ' अहमदाबाद टैक्सटाइल लेबर एसोसिएशन' की स्थापना की।

खेड़ा सत्याग्रह- 

स्वदेश वापसी के पश्चात महात्मा गाँधी का तीसरा महत्त्वपूर्ण आंदोलन गुजरात के खेड़ा क्षेत्र के किसानों को समस्याओं के निपटारे हेतु किया गया सत्याग्रह था। खेड़ा में उस समय बर्बाद हो मालगुजारी देने में असमर्थ थे। छोटे पाटीदारों (किसानों) की स्थिति समृद्ध किसानों (कम्बी पाटीदारों) की के कारण किसान तुलना में अधिक खराब थी। साथ ही 'बरइया' नामक निम्न जाति के खेतीहर मजदूर भी बढ़ती कीमतों की वजह से त्रस्त थे। गाँधीजी ने मार्च, 1918 में खेड़ा आंदोलन का नेतृत्व संभाला। इससे पूर्व मोहनलाल पाण्ड्या आदि स्थानीय नेता किसानों की समस्याओं को उठा रहे थे। जून, 1918 में सरकार द्वारा कुछ रियायतें देने के बाद यह आंदोलन स्थगित कर दिया गया। इस आंदोलन का क्षेत्र सीमित था। खेड़ा आंदोलन से गाँधीजी का प्रभाव गुजरात में फैल गया गाँधीजी के अहिंसा के सिद्धान्त एवं वैष्णव भक्ति के कारण पाटीदार किसानों ने महात्मा गाँधी का सदैव समर्थन किया। इस आंदोलन में इन्दुलाल याज्ञनिक ने गाँधीजी को पूरा सहयोग दिया।

उक्त आंदोलनों में गांधीजी के सहायक 

(1) चम्पारण सत्याग्रह में- राजेन्द्र प्रसाद, मजहरूल हक, जे.बी. कृपलानी, महादेव देसाई, अनुग्रह नारायण सिंह एवं श्रीकृष्ण सिंह 

(2) खेड़ा सत्याग्रह में- इन्दुलाल याज्ञनिक, बालभाई पटेल, शंकरलाल बैंक्ट 

(3) अहमदाबाद आन्दोलन में- अनुसूइया बेन आदि।

रौलट एक्ट के विरुद्ध सत्याग्रह 

अखिल भारतीय नेता के रूप में गाँधीजी की सर्वप्रथम पहचान रौलट एक्ट सत्याग्रह के समय बनी। न्यायाधीश सिडनी रौलेट को अध्यक्षता में बनी सेडोशन कमेटी ने क्रांतिकारी घटनाओं के संबंध में अप्रैल, 1918 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत डॉ जिसमें भारतीयों के लिए अत्यंत कठोर एवं उत्पीड़न भरे प्रावधान थे।

1918 तक गाँधीजी का रवैया ब्रिटिश शासन के प्रति सहयोगात्मक अधिक रहा। परन्तु ब्रिटिश सरकार को उत्पीड़नकारी नीति के कारण उन्हें सक्रिय राजनीति में उतरना पड़ा। फरवरी, 1919 में ब्रिटिश सरकार द्वारा रौलट एक्ट पास करने के बाद गांधीजी रणनीति में परिवर्तन आया। इस कानून, जिसे उन्होंने 'काले कानून' को संज्ञा दो, के विरोध में उन्होंने अखिल भारतीय स्तर का सत्याग्रह आरंभ कर दिया।

गाँधीजी के नेतृत्व में 30 मार्च, 1919 की तिथि रौलट एक्ट के विरोध में एक अखिल भारतीय सत्याग्रह आन्दोलन के लिए निर्धारित की गई बाद में इसे बढ़ाकर 6 अप्रैल, 1919 कर दिया गया। गाँधीजी द्वारा वायसराय को पत्र द्वारा हड़ताल की चेतावनी दी गई। राष्ट्रीय आंदोलन में 'हड़ताल' शब्द प्रयोग का पहली बार प्रयोग किया गया।

6 अप्रैल, 1919 को सम्पूर्ण देश में हड़ताल रखी गई। यह सत्याग्रह सम्पूर्ण देश में पूरे जोर-शोर से आयोजित किया जा रहा था। इसी बीच 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर (पंजाब) में वैशाखी के दिन जनरल डायर ने जलियावाला बाग हत्याकाण्ड को अंजाम दे दिया। गाँधीजी ने 18 अप्रैल को रौलट सत्याग्रह स्थगित कर दिया। सत्याग्रह का सुफल यह हुआ कि रौलट एक्ट के तहत कोई कार्यवाही नहीं की गई एवं 3 वर्ष बाद उसे वापस ले लिया गया।

असहयोग आंदोलन (Non Cooperation Movement) 1921:- 

महात्मा गाँधी ने कांग्रेस के कलकत्ता विशेष अधिवेशन 1920 में असहयोग आंदोलन का प्रस्ताव पारित करवाया तथा दिसंबर, 1920 के नागपुर वार्षिक अधिवेशन में पुनः इसे मंजूरी दे दी गई। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने जनवरी, 1921 से असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया। यह महात्मा गाँधी के नेतृत्व में प्रारंभ किया गया पहला अखिल भारतीय स्तर का जन आंदोलन था। यह आंदोलन निम्न मुख्य मांगों पर बल देने हेतु प्रारंभ किया गया था

  1. खिलाफत मुद्दा 
  2. रौलट एक्ट 
  3. पंजाब में जलियावाला बाग एवं उसके बाद के उत्पीड़न के विरुद्ध न्याय की मांग। 
  4. स्वराज्य प्राप्ति असहयोग आंदोलन के कार्यक्रम के दो मुख्य पक्ष थे (1) विरोधात्मक (या ध्वंशात्मक) (2) रचनात्मक
विरोधात्मक पक्ष के अन्तर्गत उपाधियों एवं अवैतनिक पदों का परित्याग करना, सरकारी शिक्षण संस्थाओं से बच्चों को निकालना, वकीलों द्वारा अंग्रेज न्यायालयों का बहिष्कार, विधान परिषदों के चुनावों का बहिष्कार एवं विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार शामिल थे।

कार्यक्रम के रचनात्मक पक्ष में न्यायालयों के स्थान पर पंच फैसला पीठों का गठन, राष्ट्रीय विद्यालयों व कॉलेजों की स्थापना, स्वदेशी वस्तुओं को बढ़ावा देना, चरखा एवं खादी को लोकप्रिय बनाना आदि शामिल थे। सम्पूर्ण देश विशेषतः पश्चिमी भारत, बंगाल एवं उत्तरी भारत में असहयोग आंदोलन को अभूतपूर्व सफलता मिली। अलीगढ़ में जामिया मिलिया इस्लामिया (बाद में दिल्ली में स्थानान्तरित) एवं काशी विद्यापीठ जैसी शिक्षण संस्थाओं की आन्दोलन अपने चरम पर था कि अचानक उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के चौरी-चौरा स्थान पर 5 फरवरी, 1922 को पुलिस द्वारा शांतिपूर्ण जुलूस पर गोलीबारी करने के कारण जनता ने पुलिस थाने को घेरकर आग लगा दी। जिसमें 22 पुलिकर्मियों की मृत्यु हो गईं। आन्दोलन के इस प्रकार हिंसक हो जाने के मद्देनजर गाँधीजी ने कांग्रेस कार्यसमिति बारदोली बैठक में 12 फरवरी, 1922 को इस आंदोलन को वापस ले लिया। गांधीजी के आन्दोलन को वापस और के निर्णय का तीव्र व व्यापक विरोध हुआ। गाँधीजी के असहयोग आन्दोलन का सबसे सफल प्रभाव था विदेशी कपड़ों का बहिष्कार कार्यक्रम आन्दोलन से जनमानस में अँग्रेजी सरकार के प्रति तीव्र विरोधी वातावरण बना। कांग्रेस ने हिन्दी भाषा को राष्ट्रभाषा के में स्वीकार किया। खादी का प्रयोग एवं स्वदेशी का प्रचार आगामी आंदोलन का भाग बन गया। कांग्रेस अब राष्ट्रव्या संस्था बन चुकी थी।

सविनय अवज्ञा आन्दोलन (Civil Disobedience Movement)--

जनवरी, 1930 में गाँधीजी के 11 सूत्रीय मांगपत्र को वायसराय लॉर्ड इरविन द्वारा नकार दिये जाने के बाद गाँधीजी ने कहा कि "मैंने घुटने टेककर रोटी माँगी थी और बदले में मुझे पत्थर मिला।" इसके बाद गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ करने का निर्णय लिया। सविनय अवज्ञा आन्दोलन का कार्यक्रम था-

  • नमक कानून का उबंधन करना। 
  • स्कूलों का परित्याग एवं सरकारी नौकरियों से इस्तीफा। 
  • विदेशी कपड़ों की होली जलाना। 
  • स्त्रियों का शराब की दुकानों के आगे धरना देना।

12 मार्च, 1930 में गाँधीजी ने नमक कानून तोड़ने हेतु अपने 28 अनुयायियों के साथ साबरमती आश्रम से गुजरात तट के दाण्डी नामक स्थान के लिए 200 किमी. की पैदल यात्रा 'दाण्डी मार्च' प्रारंभ किया। 6 अप्रैल 1930 को गाँधीजी ने एक मुट्ठी नमक हाथ में लेकर नमक कानून का उल्लंघन किया और इसी के साथ सम्पूर्ण देश में सविनय अवज्ञा आन्दोलन प्रारंभ हुआ। गाँधीजी एवं कई बड़े कांग्रेस नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। जुलाई, 1930 तक आन्दोलन देशव्यापी हो गया। आन्दोलन को कुचलने हेतु सरकार द्वारा स्थान स्थान पर मार्शल लॉ लगाया गया

गाँधी इरविन पैक्ट- 

8 मार्च, 1931 को वायसराय लॉर्ड इरविन एवं महात्मा गाँधी के मध्य समझौता (गाँधी-इरविन पैक्ट) हुआ। गाँधीजी सविनय अवज्ञा आन्दोलन को स्थगित करने हेतु सहमत हो गये तथा दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने हेतु राजी हो गये। अक्टूबर, 1931 में लंदन के सेंट जेम्स पैलेस में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन हुआ। कांग्रेस के एकमात्र प्रतिनिधि के रूप में गाँधीजी सम्मेलन में शामिल हुए। मुस्लिम लीग के अड़ियल रवैये के कारण सम्मेलन असफल हुआ। फलस्वरुप कांग्रेस ने जनवरी, 1932 में सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः प्रारंभ कर दिया।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री रेम्जे मैकडोनाल्ड द्वारा 1932 में साम्प्रदायिक पंचाट ( Communal Award ) की घोषणा के विरुद्ध महात्मा गाँधी ने 20 सितम्बर, 1932 को यरवदा जेल (महाराष्ट्र) में ही अनशन शुरू कर दिया। इस पंचाट में मुस्लिम वर्ग की तरह दलित वर्ग को भी पृथक निर्वाचन का अधिकार दिया गया था। तत्पश्चात् अम्बेडकर एवं गाँधीजी के मध्य पूना समझौता ( Poona Pact) हुआ जिसमें दलितों के लिए पृथक निर्वाचन को व्यवस्था को समाप्त करने पर समझौता हुआ मई, 1933 में गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन स्थगित कर दिया। अप्रैल, 1934 में कि कार्यकारिणी ने औपचारिक रूप से इसे समाप्त घोषित किया।

व्यक्तिगत सत्याग्रह- 

भारतीयों की इच्छा के विरुद्ध भारत को अंग्रेजी सरकार द्वारा द्वितीय विश्वयुद्ध में शामिल करने के विरोध में देश में हड़ताल एवं प्रदर्शन हुए। गांधी के प्रस्ताव पर 17 अक्टूबर, 1940 से कांग्रेस ने प्रतीकात्मक विरोध स्वरूप व्यक्तिगत सत्याग्रह प्रारंभ किया। यवनार से यह सत्याग्रह आरंभ किया गया। पहले सत्याग्रही विनोबा भावे एवं दुसरे सत्याग्रही जवाहरलाल नेहरू बने। इस आंदोलन में लगभग 30 हजार सत्याग्रही जेल गये। व्यक्तिगत सत्याग्रह जनव 1942 तक चला। इसमें विनोबा भावे एवं नेहरू के अलावा राजगोपालाचारी, सरोजिनी नायडू और अरुणा आसफ अली जैसे नेता भी जेल गये।

भारत छोड़ो आन्दोलन (Quit India Movement)- 

द्वितीय विश्वयुद्ध प्रारंभ होने के बाद कांग्रेस एवं सरकार में कोई समझौता न हो पाने के कारण अन्ततः कांग्रेस ने एक व प्रभावी आन्दोलन करने का निर्णय लिया। 14 जुलाई, 1942 को कांग्रेस कार्यसमिति ने वर्धा में अपनी बैठक में.. आंदोलन प्रारंभ करने हेतु गांधीजी को अधिकृत कर दिया। वर्षा बैठक में गांधीजी ने कहा कि "भारतीय समस्या का हल अंग्रेजों द्वारा भारत छोड़ देने में ही है।" गाँधीजी के इस प्रस्ताव को वर्धा प्रस्ताव कहते हैं।

8 अगस्त को अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी की बम्बई के ग्वालिया टैंक मैदान ( अब अगस्त क्रांति मैदान) में हुई ऐतिहासिक बैठक में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' प्रारंभ करने का प्रस्ताव पारित हुआ। प्रस्ताव में कहा गया कि " भारत में ब्रिटिश शासन का तत्काल अंत, भारत के लिए एवं मित्र राष्ट्रों के आदर्श के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस पर ही युद्ध का भविष्य एवं स्वतंत्रता और प्रजातंत्र की सफलता निर्भर है" गाँधीजी ने 'करो या मरो' का नारा दिया एवं कहा कि अब कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य से कम के किसी भी सरकारी प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेगी। सरकार ने सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया। गाँधीजी को आगा खाँ महल में कैद रखा गया। काँग्रेस को गैर कानूनी संगठन घोषित कर दिया गया। 9 अगस्त, 1942 को समस्त देश में भारत छोड़ो आंदोलन पूरे वेग से प्रारंभ हुआ। गाँधीजों ने कहा कि "या तो हम भारत को पूर्ण स्वतंत्र कराएंगे या इस प्रयास में मर मिटेंगे।" मुस्लिम लीग व कम्यूनिस्ट पार्टी ने भारत छोड़ो आन्दोलन का बहिष्कार किया। डॉ. अम्बेडकर ने इस आंदोलन को अनुत्तरदायित्त्वपूर्ण कार्य बताया। यह आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता के लिए किया सबसे महान प्रयास था। भारत छोड़ो आन्दोलन के बाद इस तरह का कोई वृहद् स्तर का जन आन्दोलन नहीं छेड़ा गया परन्तु धीरे-धीरे की गई राजनीतिक कार्यवाहियों एवं प्रयासों से अन्ततः 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ जिसमें महात्मा गाँधी के निःस्वार्थ एवं अविस्मरणीय योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।

महात्मा गाँधी ने भारत की स्वतंत्रता के लिए जो प्रयास किये वे अद्वितीय थे। उनके द्वारा कांग्रेस के राष्ट्रीय आन्दोलन को जो छोटे वर्ग तक सीमित था, जन-जन तक पहुँचाया गया तथा देश का बच्चा-बच्चा देश की स्वतंत्रता के यज्ञ में आहूति देने के लिए स्वयं तत्पर हो गया। गाँधीजी जननायक थे। वे महान चिंतक, सत्य के अनुयायी, दरिद्र नारायण के सेवक, हरिजन सेवक, अहिंसा के  व्यावहारिक अनुयायी एवं मानवीय मूल्यों के महान संस्थापक थे। महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह एवं अहिंसा को व्यावहारिक जीवन में प्रयोग कर देश को स्वतंत्रता दिलाई। उन्होंने राष्ट्रीय दोलनको उद्वेलित किया, सरकार के प्रति जन-जन में विरोधी भावना जाग्रत की तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की भावना पैदा की। गाँधीजी ने खादी के प्रयोग एवं स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग को बढ़ावा दिया ताकि हमारे देश के कुटीर उद्योग धंधे न: पनप सकें एवं लोगों की आर्थिक स्थिति सुधर सके। उन्होंने देश में बढ़ रही साम्प्रदायिकता को समाप्त करने हेतु अथक प्रयत्न किये। हिन्दू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने हेतु उन्होंने 1919 में प्रारंभ खिलाफत आंदोलन को पूरा समर्थन दिया। मैक्डोनाल्ड के साम्प्रदायिक निर्णय के विरुद्ध आमरण अनशन किया। जिसके परिणामस्वरूप पूना पैक्ट हुआ। इसके बद जब-जब भी देश में साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ा, गाँधीजी ने अपने उपवास व आमरण अनशन आदि प्रयोगों द्वारा उसको कम करने का प्रयास किया।

गांधीजी ने सदैव अपनी विचारधारा में निर्धन लोगों एवं किसानों को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया तथा इनके उद्धार हेतु उन्होंने ग्रामीण पुनर्निर्माण कार्यक्रम पर बल दिया। ग्रामीणों के आर्थिक स्वावलम्बन हेतु महात्मा गाँधी ने चरखा, खादी आदि को पुरजोर वकालात की। उन्होंने किसानों एवं जमींदारों को आपसी वैमनस्य समाप्त कर अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुट हो स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने हेतु प्रोत्साहित किया। उन्होंने ग्राम संघ की स्थापना की। उन्होंने हाथ के कते एवं बुने कपड़े पहनने पर बल दिया ताकि गाँव के निर्धन लोगों की आर्थिक सहायता हो सके और वे उन्नत हो सकें। महात्मा गाँधी द्वारा 1921 में प्रारंभ असहयोग आंदोलन में पहली बार अखिल भारतीय स्तर पर लोग जन-आंदोलनों के लिए एकजुट हुए एवं उनमें राजनीतिक चेतना जाग्रत हुई।

गांधीजी ने अंग्रेजी सरकार के दमनकारी या भारतीय जनता के लिए अहितकर कानूनों का घोर विरोध किया। 1930 में नमक कानून तोड़ने हेतु स्वयं ने दाण्डीमार्च किया और सविनय अवज्ञा आंदोलन प्रारंभ किया।

महात्मा गाँधी ने अछूतोद्धार एवं हरिजनों के उत्थान हेतु ऑल इण्डिया एन्टी अनटचेबिलिटी संस्था' की स्थापना की। अछूतों को उन्होंने 'हरिजन' नाम दिया। जनवरी, 1933 से 'हरिजन' नामक साप्ताहिक पत्र प्रारंभ किया। हरिजन उत्थान हेतु उन्होंने 12 हजार मील से अधिक की पैदल यात्रा की। 1934 में तो गाँधीजी कांग्रेस से अलग हो गये एवं हरिजन उत्थान कार्यक्रम को अपना मुख्य लक्ष्य बना लिया। महात्मा गाँधी ने गौ रक्षा के अति महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए गोरक्षा संघ बनाया।

गाँधीजी ने भारतीय जन-जन को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ा। उनके आह्वान पर महिलाएं, जो अब तक पर्दे में रहती थी, घर से बाहर निकली और बड़े पैमाने पर उन्होंने राजनीतिक आंदोलन में भागीदारी अदा की।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के सैनिक के रूप में महात्मा गाँधी का योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने राजनीतिक लक्ष्य के लिए नैतिक साधनों का प्रयोग किया। महात्मा गाँधी की सबसे बड़ी देन यह है कि उन्होंने भारत के लोगों के दिलों से सरकार एवं नौकरशाही का भय दूर कर दिया। गाँधीजी ने सैकड़ों वर्षों की दासता के कारण डरपोक बन चुके भारतीयों के मन से दासता की भावना को समाप्त किया। उन्होंने लोगों के मन से भय निकाल दिया तथा लोगों के मन में आत्मविश्वास, आत्मसम्मान एवं लड़ने की इच्छा उत्पन्न की। जिससे लोगों ने निडर होकर आजादी की लड़ाई में भाग लिया।

महात्मा गाँधी ने देश में समाज सुधार का महत्ती कार्य भी किया। उन्होंने हिन्दू धर्म को कट्टरता एवं अन्धविश्वास से दूर रखने का भरसक प्रयत्न किया। वे ऐसे समाज के निर्माण हेतु प्रयत्नशील रहे जिसमें जातिवाद और अस्पृश्यता न हो एवं जिसमें लोगों के हृदय में समता की भावना हो। उनके कार्यों एवं उपदेशों से जनता में धर्मनिरपेक्षता एवं राष्ट्रवाद पनपा एवं जातिवाद व साम्प्रदायिकता कम हुई।

महात्मा गाँधी ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में जिन तकनीकों का प्रयोग किया उनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान 'सत्याग्रह एवं अहिंसा' का था। गाँधीजी जहाँ अहिंसा के सिद्धान्त के प्रबल पक्षधर थे वहीं उनका यह भी मानना था कि अन्याय के सम्मुख कायरतापूर्ण समर्पण करने की बजाय हिंसा का मार्ग अपना लेना अधिक श्रेयस्कर होता है। गाँधीजी ने राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन को विदेशी शासन के खिलाफ अखिल भारतीय स्तर प्रदान कर जन-जन का आंदोलन बना दिया। गाँधीजी के आविर्भाव से पूर्व कांग्रेस का कार्यक्षेत्र केवल शहरों एवं कस्बों तथा बुद्धिजोवियों,जिनका आम जनता से कोई मेल न था, तक ही था। महात्मा गाँधी ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में एक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने इस आंदोलन को जन-जन तक फैलाया। गांधीजी एक आम भारतीय के समान जीवन बिताने में विश्वास रखते थे जो कि उनके व्यक्तित्व में भी स्पष्ट झलकता था। उनकी इसी राजनैतिक शैली ने उन्हें कुछ ही समय में अखिल भारतीय स्तर पर लोकप्रिय जन-नेता बना दिया। इससे राजनैतिक जीवनशैली के कारण आम भारतीय जनों ने उन्हें अपने पर्याप्त नजदीक पाया और गांधीजी के आंदोलनों में अन्तर्मन से पर्याप्त सहयोग प्रदान किया।

भारतीय संसद ने महात्मा गाँधी की जन्म शताब्दी के उपलक्ष में भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में उनके योगदान को स्मरण करते हुए 24 दिसंबर 1969 को प्रस्ताव पास किया कि "यह सदन महात्मा गाँधी शताब्दी के अवसर पर अपने आदरपूर्ण श्रद्धांजलि राष्ट्रपिता के प्रति अर्पित करता है जिन्होंने अहिंसात्मक तरीकों से देश को स्वतंत्रता दिलाई, जिन्होंने जनता में एक नई स्फूर्ति फूंक दी, जिन्होंने करोड़ों पीड़ित एवं पददलित लोगों को ऊपर उठाया, जिन्होंने लोगों में सेवा एवं समर्पण की भावना जगाई तथा अपनी अनन्त कृतज्ञता को उस अहिंसा की मूर्ति के प्रति अभिलिखित रूप से प्रकट करता है।'

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